होली की कथा, Holi Ki Katha

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Holi Ki Katha

नस्कर दोस्तों आप सभी का स्वागत है हमारे ब्लॉग पोस्ट कृष्णाव कोठरी में ! दोस्तों आज के इस ब्लॉग पोस्ट में आपको बताएंगे होली क्यों मनाई जाती है (Holi Ki Katha) जाने इस त्योहार से जुड़ी कथा तो चलिए पड़ते है होली मानाने की ये कथा।

पौराणिक काल में हिरण कश्यप नाम का एक दत्याराज हुआ करता था, उसने गोद तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह धरती पर मारेगा, ना आसमान में, न दिन में मरेगा, और ना ही रात में, कोई भी अस्त्र-शस्त्र उसका वर्णन नहीं कर सकेंगे। ना बाहर मारेगा और ना घर में और ना ही कोई जानवर या फिर इंसान उसे मार सकेगा।

देवताओं से यह वरदान पाकर वह खुद को अमर समझने लगा और लोगों पर अत्याचार करने लगा वरदान के अहंकार में वह खुद को भगवान मानने लगा था और लोगों को खुद की पूजा करने को विवश करने लगा परंतु ऐसे में उसका स्वयं का पुत्र प्रहलाद जो एक बालक ही था, वह उसके खिलाफ हो गया एक दिन की बात है की राजमहल में हिरण कश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को अपने पास बुलाया, और उससे पूछा तुम्हारा सबसे बड़ा धर्म क्या है तब प्रहलाद ने जवाब देते हुए कहा, पिताजी हर प्राणी का सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह भगवान विष्णु की प्रार्थना में अपना सारा जीवन लगा दे. यह सुनकर हिरण कश्यप को क्रोध से लाल हो गया और बोला तुम्हारी मेरे सबसे बड़े दुश्मन विष्णु की पूजा की बात करने की हिम्मत कैसे हुई.

Holi Ki Katha

तब प्रहलाद बोला पिताजी क्रोधित ना हो एक बार आप भी भगवान विष्णु का नाम लेकर तो देखिए आपका मंदिर पवित्र विचारों से भर जाएगा, यह सुन कर हिरण कश्यप और क्रोधित हो उठा और उसने अपने पुत्र को धक्का देकर निचे गिरा दिया। वह बोला आज मैं तेरा बंद करके सदा के लिए तेरा विष्णु नाम का भूत उतार दूंगा। और उसके बाद वह प्रहलाद को गधा से मरने लगा, उधर जब इस बात का पता प्रहलाद की माता को चला तो वह दौड़ी दौड़ी आई और हिरण कश्यप अर्थात अपने पति से रोते हुए बोली है महाराज आप अपने ही हाथों से अपने पुत्र का वध कैसे कर सकते हैं यह सुन हरिंदर कश्यप ने कहा तुम चुप हो जाओ यह मेरा पुत्र नहीं मेरा सबसे बड़ा शत्रु है और मैं अपने शत्रुओं को कभी जीवित नहीं छोड़ना इतना कहकर हारण्य कश्यप ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि महल से बाहर ले जाकर सारी प्रजा के सामने इसका सर धङ से अलग कर दो ताकि इसके बाद कोई भी डर से विष्णु का नाम ही ना ले.

यह सुन प्रहलाद की माता हिरण कश्यप के चरणों में गिरती हुई बोली महाराज क्षमा कर दीजिए इसे अभी तो यह बालक है लेकिन हिरण कश्यप उसकी एक न सुनी और उसके सैनिक प्रहलाद को लेकर बाहर चले गए,  बाहर जाकर सारी प्रजा के सामने जैसे ही एक सैनिक ने उसका सर काटने के लिए तलवार उठाई वैसे ही वह तलवार फूलों में परिवर्तित हो गई, उसके बाद दूसरे सैनिक ने अपने भले से प्रहलाद पर प्रहार किया लेकिन उसे वाले ने उसका ही वर्क कर डाला, यह देख बाकी के सैनिक डर गए और वहां से भाग गए उसके बाद हिरण कश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को पहाड़ से नीचे फेंकाया, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से नीचे प्रहलाद के लिए फूलों की एक सेज बन गई और वह सकुशल अपने महल वापस लौट आया.

उधर प्रहलाद के जीवित होने की सूचना जब उसके पिता को फिर मिली तो उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रहलाद को कारागार में बंद कर उसमें सांप छोड़ दो. सैनिकों ने ऐसा ही किया परंतु सांप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाए, जो भी शाम प्रहलाद को डसने जाता वह वही जलकर भस्म हो जाता, फिर इसके बाद हिरण कश्यप ने प्रहलाद को जंगली हाथियों से कुचलवाने का आदेश दिया परंतु हाथी उसे कुचलना के बजाय फूल माला चढ़ाने लगे और इस तरह हिरण कश्यप और उसके सैनिकों ने प्रहलाद को मारने के कई प्रयास किए पर वह सफल नहीं हो पाए,

फिर अंत में हरी ने कश्यपन ने अपनी बहन होलिका को अपने पास बुलाया और बोला बहन अब तुम ही मेरी मदद कर सकती हो तुम्हें जो वरदान शुरू एक दिव्य वस्त्र मिला हुआ है अब उसे वस्त्र के इस्तेमाल करने की घड़ी आ गई है अपने भाई की बात सुनकर होली का बोली भैया इस दिव्य वस्त्र से किसकी रक्षा करनी है हिरण कश्यप जवाब में बोला रक्षा नहीं बल्कि तुम्हें इस दिव्य वस्त्र की मदद से मेरे सबसे बड़े शत्रु प्रहलाद का वध करना है,  यह सुन होली का बोली क्या भैया आप अपने ही पुत्र का वध करना चाहते हैं मगर क्यों? तब हरि ने कश्यप ने कहा बहन उसे मेरा पुत्र मत कहो क्योंकि वह पुत्र के नाम पर कलंक है कलंक और हां मैंने तुम्हें इस समय सलाह देने के लिए नहीं बुलाया बल्कि बिना कोई प्रश्न की मेरे आदेशों का पालन करने के लिए बुलाया है. ये सुनके होलिका बोली ठीक है भैया मैं आपके आदेश का पालन करने के लिए तैयार हूं जब भी आपका मन करे आप मुझे याद कर लीजिएगा मैं यहां हाजिर हो जाऊंगी। और इतना कहकर होली का वहां से चली गई.

इधर होलिका के जाने के बाद हिरण कश्यप ने महल के बीचों बीच एक बड़ी सी चिता तैयार करवाई उसे पूरा विश्वास था कि इस बार कोई भी शक्ति प्रहलाद को नहीं बचा सकती फिर उसने होलिका को याद किया होली का तत्काल ही वहां अपने दिव्या वेस्टन के साथ उपस्थित हो गए उसका पूरा शरीर दिव्या वेस्टन से ढका हुआ था फिर हरिणी कश्यप उन्हें अपने सैनिकों को प्रहलाद को लाने का आदेश दिया राजा का आदेश सुनते ही सैनिक कुछ ही देर में प्रहलाद को लेकर वहां उपस्थित हो गए फिर हिरण कश्यप आदेशानुसार होलिका प्रहलाद को लेकर चिता पर बैठ गयी.

उसके बाद हिरण कश्यप ने अपने सैनिको को चिता में अग्नि लगाने का आदेश दिया आदेश सुनते ही सैनिकों ने चिता में एग्री लगा दी देखते ही देखते चिता से अग्नि की ऊंची लपटें आसमान को छूने लगी ये देख प्रहलाद ने अपने दोनों हाथ जोड़कर और भगवान विष्णु के नाम का जाप करने लगा. कुछ समय बाद चिता से चीको की आवाजे आने लगी ये सुन हिरण कश्यप को बहुत प्रसादन हुआ और कहने लगा प्रहलाद आज तेरा विष्णु भी तुझे मरने से नहीं बचा सकता। परंतु जब चीता की अग्नि शांत हुई तब हिरण कश्यप को प्रहलाद को जिंदा देखकर अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ और वह रोते हुए कहने लगा नहीं मेरी बहन होली का नहीं मर सकती तो मित्रों इस प्रकार इस बार भी भगवान ने अपने भक्त प्रहलाद की जान बचा ली होली का तो चल गई परंतु विष्णु भक्त प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ और मित्रों हर वर्ष हम लोग इसी होली का को जलाते हैं और अगले दिन रंगों का त्योहार होली मनाते हैं.

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